Delhi: दिल्ली की राजनीति में विधानसभा चुनावों का एक महत्वपूर्ण और विविधतापूर्ण इतिहास रहा है, जिसने समय-समय पर राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया है। दिल्ली, जो भारत की राजधानी है, ने विभिन्न राजनीतिक दलों के उत्थान और पतन के साथ-साथ नई राजनीतिक धाराओं के उदय को भी देखा है।
प्रारंभिक दौर:
1952 में स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनावों के साथ ही दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव आयोजित किए गए। उस समय, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अधिकांश सीटों पर विजय प्राप्त की और दिल्ली की राजनीति में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। 1966 में, दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया, जिसके बाद विधानसभा को भंग कर दिया गया और मुख्यमंत्री का पद समाप्त हो गया।
विधानसभा की पुनर्स्थापना:
1991 में, 69वें संविधान संशोधन के माध्यम से दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा दिया गया और 1993 में विधानसभा का पुनर्गठन किया गया। 1993 के चुनावों में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बहुमत हासिल किया और मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने।
1993: पहली जीत और नेतृत्व परिवर्तन
1993 में, दिल्ली में पहली बार विधानसभा चुनाव आयोजित हुए, जिसमें भाजपा ने 42.8% वोट शेयर के साथ 49 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। मदन लाल खुराना को मुख्यमंत्री बनाया गया, जो जनता के बीच ‘दिल्ली का शेर’ के नाम से प्रसिद्ध थे। हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान कुछ विवाद उत्पन्न हुए, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 1996 में इस्तीफा देना पड़ा। उनके बाद, साहिब सिंह वर्मा ने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन 1998 में पार्टी नेतृत्व ने उन्हें हटाकर सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया। लगातार नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद, भाजपा 1998 के चुनाव में कांग्रेस से हार गई, और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं।
शीला दीक्षित का कार्यकाल:
1998 के चुनावों में, कांग्रेस ने वापसी की और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 2003 और 2008 के चुनावों में भी जीत हासिल की, जिससे शीला दीक्षित का 15 वर्षों का कार्यकाल पूरा हुआ। उनके कार्यकाल में दिल्ली में बुनियादी ढांचे का विकास और मेट्रो परियोजना की शुरुआत हुई।
आम आदमी पार्टी का उदय:
2013 के चुनावों में, एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में आम आदमी पार्टी (आप) का उदय हुआ, जिसने 28 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया जबकि भाजपा ने 32 सीटें हासिल कीं, लेकिन बहुमत से चार सीटें कम रह गई।। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई, लेकिन 49 दिनों के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
2015 का ऐतिहासिक जनादेश:
2015 के चुनावों में, आप ने 70 में से 67 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। भाजपा को मात्र 3 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई। इस चुनाव ने दिल्ली की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा।
2020 के चुनाव:
2020 में, आप ने फिर से बहुमत हासिल किया, हालांकि इस बार सीटों की संख्या 62 रही। भाजपा ने 8 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस फिर से शून्य पर रही। अरविंद केजरीवाल ने लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
1998-2013: विपक्ष में भाजपा
1998 से 2013 तक, भाजपा दिल्ली विधानसभा में विपक्ष की भूमिका में रही। इस अवधि में, पार्टी ने विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास किया, लेकिन सत्ता में वापसी नहीं कर सकी।
2013 के चुनाव में, एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में आम आदमी पार्टी (आप) का उदय हुआ। आप ने 28 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा ने 32 सीटें हासिल कीं, लेकिन बहुमत से चार सीटें कम रह गई। कांग्रेस के समर्थन से अरविंद केजरीवाल ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
2015 और 2020: भाजपा की चुनौतियाँ
2015 के चुनाव में, आप ने 70 में से 67 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि भाजपा को मात्र 3 सीटें मिलीं। 2020 में भी, आप ने 62 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की, और भाजपा को 8 सीटें मिलीं।
2025: संभावित वापसी
2025 के चुनावों के एग्जिट पोल्स में भाजपा की सरकार बनने की संभावना जताई जा रही है। यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो यह 27 वर्षों के बाद दिल्ली में उसकी वापसी होगी। चुनावों के परिणाम 8 फरवरी 2025 को घोषित किए जाएंगे।
दिल्ली में भाजपा का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 1993 में पहली बार सत्ता में आने के बाद, पार्टी ने विभिन्न चुनौतियों का सामना किया है। 2025 के चुनावों में संभावित वापसी के साथ, भाजपा दिल्ली की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ने की ओर अग्रसर है।
दिल्ली विधानसभा चुनावों का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है, जिसमें विभिन्न दलों ने अपनी छाप छोड़ी है। आगामी चुनावों में क्या परिणाम होंगे, यह देखने वाली बात होगी, लेकिन यह निश्चित है कि दिल्ली की जनता ने हमेशा परिवर्तन को स्वीकारा है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।