44 साल पहले फिरोजाबाद जनपद के जसराना थाना क्षेत्र के ग्राम देहुली की दलित बस्ती में 24 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड की सुनवाई मैनपुरी दीवानी स्थित स्पेशल जज डकैती इंद्रा सिंह द्वारा की जा रही है। मंगलवार को कोर्ट में मामले की अंतिम सुनवाई की गई। इस हत्याकांड में 13 हत्यारोपियों की मौत हो चुकी है। एक हत्यारोपी अभी फरार है। तीन आरोपियों को घटना का दोषी ठहराया गया है। 18 मार्च को मामले में सजा सुनाई जाएगी।
फिरोजाबाद जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी की दूरी पर स्थित दिहुली गांव उस रात गोलियों की आवाज से दहल उठा था। इस जनसंहार में कुल 17 आरोपी थे, जिनमें से 13 की पहले ही मौत हो चुकी है। हत्याकांड में कुल 24 लोग मारे गए थे।
उत्तर प्रदेश के देहुली में दलित नरसंहार मामले में मैनपुरी जिले की कोर्ट ने 44 साल बाद मंगलवार को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने तीन आरोपी रामसेवक, कप्तान सिंह और रामपाल को फांसी की सजा सुनाई. इस हत्याकांड में 17 लोगों को आरोपी ठहराया गया था। जिसमें 14 की पहले ही मौत हो चुकी है। विशेष न्यायाधीश इंदिरा सिंह ने इस मामले में कप्तान सिंह (60), रामपाल (60) और राम सेवक (70) को दोषी ठहराते हुए उन्हें मौत की सजा सुनाई। अदालत ने दोषियों पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
1981 में 24 दलितों की कर दी गई थी हत्या
सरकारी वकील रोहित शुक्ला ने बताया कि 18 नवंबर 1981 को हुई जनसंहार की इस घटना में छह महीने और दो साल की उम्र के दो बच्चों समेत 24 दलितों की डकैतों के एक गिरोह ने हत्या कर दी थी।
पुलिस की वर्दी में 17 डकैतों ने दलितों की कर दी थी हत्या
18 नवंबर 1981 की शाम को पुलिस की वर्दी पहने 17 डकैतों के एक गिरोह ने मैनपुरी के देहुली में 24 दलितों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में सभी आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास) और 396 (हत्या के साथ डकैती) के तहत केस दर्ज कराया गया था।
कुंवरपाल की एक अगड़ी जाति की महिला से दोस्ती थी और ये बात अगड़ी जाति से आने वाली संतोष और राधे को बर्दाश्त नहीं हुई। यहीं से इनके बीच की दुश्मनी की शुरुआत हुई थी। इसके कुछ समय बाद कुंवरपाल की संदिग्ध हालात में हत्या कर दी गई। इस पर एक्शन लेते हुए पुलिस ने संतोष-राधे गिरोह के दो सदस्यों को गिरफ़्तार कर हथियार बरामद किए थे संतोष, राधे और कुंवरपाल हत्याकांड के बाकी आरोपियों को शक था कि उनके साथियों की गिरफ्तारी के पीछे इलाके के दलितों का हाथ है। पुलिस ने भी हत्या के बाद दलित समुदाय के तीन लोगों को गवाह बनाया था. पुलिस चार्जशीट के मुताबिक अगड़ी और पिछड़ी जाति की इसी दुश्मनी की वजह से दिहुली में जनसंहार हुआ था।
चार घंटे तक ताबड़तोड़ फायरिंग
इंडिया टुडे के मुताबिक संतोष-राधे गिरोह के 14 सदस्य पुलिस वर्दी में दलितों के गांव दिहुली पहुंचे और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। शाम 5 बजे से शुरू हुई फायरिंग चार घंटे तक चली। गोली लगने ने 23 लोगों की मौके पर ही मौत हो चुकी थी जबकि एक को अस्पताल में मृत घोषित किया गया। पुलिस जब तक मौके पर पहुंची तब तक सभी आरोपी फरार हो चुके थे। उत्तर प्रदेश में तब विश्वनाथ प्रताप सिंह मुख्यमंत्री थे। इस जनसंहार के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिहुली गांव का दौरा किया था। विपक्ष ने इस हत्याकांड के बाद सरकार पर सवाल खड़े किए थे। तब विपक्ष के नेता बाबू जगजीवनराम ने भी इस गांव का दौरा किया था। वारदात के बाद दलित समाज के लोग दिहुली गांव से पलायन करने लगे। इसके बाद पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी गांव में कई महीनों तक कैंप लगाकर रहे ताकि लोगों को सुरक्षा महसूस हो।
ट्रॉली में भरकर भेजे गए थे शव
चश्मदीदों ने बताया कि संतोष-राधे गिरोह ने पूरे दलित मोहल्ले को घेर रखा था, जो भी दिखाई दिया उसे गोली मारते गए। रात में हुई इस गोलीबारी के बाद लोगों के शव सड़क पर पड़े थे और हर कोई जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहा था। कुछ लोग तो इस भगदड़ में ही जख्मी हो गए। बदमाशों ने पुरुष-महिला, बच्चे किसी पर भी रहम नहीं किया और जो सामने आया उसे मौत के घाट उतार दिया। मृतकों के शव दूसरे दिन ट्रैक्टर ट्रॉली में भरकर मैनपुरी भेजे गए थे। वहां डॉक्टरों की टीम ने इनका पोस्टमार्टम किया था।
घटना का सारांश:
18 नवंबर 1981 को देहुली गांव में 24 दलितों, जिनमें महिलाएं और दो बच्चे शामिल थे, की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस नरसंहार को 17 डकैतों के एक गिरोह ने अंजाम दिया था, जिन्होंने खाकी वर्दी पहनकर गांव पर हमला किया था। इस हमले का उद्देश्य उन दलित गवाहों को सबक सिखाना था जिन्होंने उच्च जाति के अपराधियों के खिलाफ गवाही दी थी।
न्यायिक प्रक्रिया:
इस मामले में कुल 17 आरोपी थे, जिनमें से 14 की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई, जबकि एक आरोपी फरार है। शेष तीन आरोपी, जो अब 70 वर्ष की आयु के हैं, को विशेष अदालत ने दोषी ठहराया है और मृत्युदंड की सजा सुनाई है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक दोषी पर ₹50,000 का जुर्माना भी लगाया गया है।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव:
यह निर्णय न केवल पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की प्रतीक्षा का अंत है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अन्याय के खिलाफ कार्रवाई अवश्य होती है। यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली की चुनौतियों और उसकी धीमी गति को भी उजागर करता है, विशेषकर जब पीड़ित समाज के कमजोर वर्ग से हों।
1981 में मैनपुरी के देहुली गांव में 24 दलितों की हत्या के मामले में 44 वर्षों बाद तीन आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है, जो न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।